रोज़ मैं जाने कहाँ ग़ुम हो जाती हूँ
खुद से निकल कर खुद में खो जाती हूँ
लफ्ज़ घूमते रहते हैं मेरे चारों तरफ
एक भंवर में फँसी ज़िन्दगी सी होती हूँ
चाहती तो हूँ कि कोई बुलाये कभी
लेकिन कोई आवाज़ नहीं सुनती हूँ
हालत ज़िंदगी के कभी बदले तो सही
कहीं कोई हमनवा भी नहीं देखती हूँ
सारी दुनिया में है भीड़ बहुत लोगों क़ी
पर जो अपना सा हो वो कहाँ देख पाती हूँ
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बेवजह उनकी आँखों में
खुद को तलाशा किये हम
कि ख़ुश्क आँखों में
ख़्वाब कहाँ ज़िंदा रहते हैं
उनकी आँखों कि नमी
किसी और के लिए थी
न जाने हम क्यों समझ
बैठे कि हम रहते हैं……
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बहुत ढूंढा मैने
पर
अब नही मिलते हैं

वो पुराने दिन
जो
मीलों लम्बे होते थे

जिन दिनों में वक्त काटने के तरीके खोजते थे
और रातें मीलों तक
फैली हुआ करती थी

बहुत ढूंढा मैने
पर
अब नहीं मिलते हैं

दोस्तों के दोस्त भी जान से ज्यादा होते थे
काम भी सबके बस अपने नाम होते थे

बहुत ढूंढा मैने
पर
अब नहीं मिलते हैं

रातें लम्बी लम्बी और लम्बी हो जाती थी
दोपहर तक नींदे पूरी नहीं हो पाती थी

बहुत ढूंढा मैने
पर
अब नहीं मिलते हैं
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गलती सुधारने का मोका तो उसी दिन
से मिलना बंध हो गया था,
जिस दिन हाथ में पेंसिल की जगह पेन
थमा दीया गया था ..!!!
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